मुनीर अहमद मोमिन 

भिवंडी। हिन्दू धर्म के अनुसार सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना “मकर-संक्रांति” कहलाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनि के घर स्वयं उनसे मिलने गए थे। संक्रांति के लगते ही सूर्य उत्तरायण हो जाते है। हिन्दू धर्म में इस दिन व्रत और दान (विशेषकर तिल के दान का) विशेष महत्व होता है। मकर संक्रांति का त्योहार नई ऋतु के आगमन का प्रतीक है। ये त्योहार शरद ऋतु के खत्म होने का प्रतीक माना जाता है। इसे उत्तरायण के त्योहार के नाम से भी जाना जाता है। इस उत्सव को अनेकों स्थानों पर घुघुति, पोंगल, टुसु, बिहू अदि भिन्न प्रकार के नामों से पुकारा जाता है। जैसे कि कर्नाटक, केरल, आंध्र प्रदेश में संक्रान्ति, बिहार, यूपी में खिचड़ी तथा तमिलनाडु में पोंगल नाम से संबोधित किया जाता है। इसी तरह लोहड़ी का त्यौहार मकर संक्राति से एक दिन पहले हर वर्ष मनाया जाता हैं। लोहड़ी त्यौहार की उत्पत्ति के बारे में भी काफी मान्यताएं हैं, जो पंजाब के त्यौहार से जुड़ी हुई मानी जाती हैं। लोहड़ी का त्यौहार पंजाबियों तथा हरियाणवी लोगों का प्रमुख त्योहार माना जाता है।

         मकर संक्रांति अधिकतर जनवरी माह की 14 तारीख को आती है। लेकिन पिछले 24 सालों में 10 वर्ष 14 जनवरी और 14 वर्ष 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाया गया। जिसमें 2021 और 2022 में 14 और 15 जनवरी दोनों दिन मनी थी मकर संक्रांति। पिछले साल 2023 में भी 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई गई थी और इस साल भी 15 जनवरी को ही मनाया जा रहा है। 19 वीं शताब्दी में शुरुआती समय में मकर संक्रांति 13-14 जनवरी के मध्य पुण्यकाल बदलता रहा और फिर 14 जनवरी पर कई वर्षो के लिए स्थिर हो गया। अब पुनः 14-15 जनवरी के मध्य परिवर्तित होते हुए 15 जनवरी पर स्थिर होने की ओर यह क्रम बढ़ गया है। अगले 72-80 वर्षों में संक्रांति की तारीख एक दिन आगे बढ़कर 15-16 जनवरी में खिसक जाएगी। बताया जाता है कि 900 साल पहले मकर संक्रांति 1 जनवरी को मनाई जाती थी। बता दें कि सूर्य की चाल के आधार पर ही यह अनुमान लगाया जा रहा है कि अब से 5000 साल बाद मकर संक्रांति फरवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी। माना जाता है कि राजा हर्षवर्धन के समय में मकर संक्रांति का त्योहार 24 दिसंबर को मनाया जाता था। जबकि अकबर के जमाने में ये पर्व 10 जनवरी को मनाया गया और शिवाजी के समय में 11 जनवरी को। 

           भविष्य पुराण के अनुसार सूर्य के उत्तरायण या दक्षिणायन के दिन संक्रांति व्रत करना चाहिए। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व होता है। गंगा को धरती पर लाने वाले भागीरथ ने अपने अपने पूर्वजों के आत्मा की शांति के लिए इस दिन तर्पण किया था। उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद इस दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी। इसलिेए मकर सक्रांति पर गंगा सागर में मेला लगता है। सनातन धर्मावलम्बियों के मुताबिक़ दुर्गा ने दानव महिषासुर का वध करने के लिए इसी दिन धरती पर कदम रखा था। महाभारत में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर स्वेच्छा से शरीर का त्याग किया था। खगोलशास्त्रियों के अनुसार पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमते हुए 72 से 90 सालों में एक डिग्री पीछे हो जाती है। इससे सूर्य मकर राशि में एक दिन देरी से प्रवेश करता है यानी मकर संक्रांति का समय 72 से 90 साल में एक दिन आगे खिसक जाता है। माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर संक्रांति 1 जनवरी को मनाई जाती थी। ज्योतिषाचार्य पं. आनंद शुक्ला के अनुसार 14 जनवरी को मकर संक्रांति पहली बार 1902 में मनाई गई थी। इससे पहले 18वीं सदी में 12 और 13 जनवरी को मनाई जाती थी। वहीं 1964 में मकर संक्रांति पहली बार 15 जनवरी को मनाई गई थी। इसके बाद हर तीसरे साल अधिक मास होने से दूसरे और तीसरे साल 14 जनवरी को, चौथे साल 15 जनवरी को मनाई जाने लगी। इस तरह 2077 में आखिरी बार 14 जनवरी को मकर संक्रांति मनाई जाएगी।

       सभी पाठकों को मकर संक्रांति, लोहड़ी, खिचड़ी, घुघुति, पोंगल, टुसु व बिहू पर्व की ढेरों अशेष शुभ/मंगल कामनाएं।

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