मुनीर अहमद मोमिन 

मुंबई। पापा के कोटे से कांग्रेस में जमकर सुख भोगे और मलाई काटे मुरली सुत मिलिंद देवड़ा के पार्टी छोड़ने पर राजनीतिक चर्चाओं का बाजार गर्म है। अब वह ऐलानिया तौर पर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ मुनाफे की राजनीति करेंगे। उन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद बहुत सारी बातें कहीं और लिखी। लेकिन अंदर की खबर यह है कि मिलिंद देवड़ा ने खुद कांग्रेस छोड़ी नहीं है, बल्कि उन्हें एक तरह से बेइज्जत करके या धकियाकर बहुत ही ठोस ढंग से पार्टी छोड़ने पर मजबूर किया गया है। कांग्रेस पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि भारत जोड़ो यात्रा भाग-2 से पहले ही राहुल गांधी ने मिलिंद को स्पष्ट संदेश दे दिया था कि आप या तो उद्योगपतियों की दलाली करना छोड़कर जनता के बीच जाइए और नहीं तो अपना रास्ता देख लीजिए। 

            लेकिन बावजूद इसके गोदी मीडिया, गोदी अखबारों और टीवी चैनलों ने क्या खबर चलाई चलाई, कि न्याय यात्रा से पहले ही कांग्रेस को झटका। भारत जोड़ने में टूटने लगी कांग्रेस। मुंबई कांग्रेस में मचने वाली है भगदड़ आदि, इत्यादि। एक अंग्रेजी का अखबार ने तो दल्लागिरी की सारी हदें पार करते हुए यहां तक छाप दिया कि मिलिंद देवड़ा के कांग्रेस छोड़ने के बाद दक्षिण मुंबई से कांग्रेस के पास चुनाव लड़ने वाला कोई उम्मीदवार तक नहीं है। वह अंतिम व्यक्ति थे दक्षिण मुंबई से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले। इस तरह नेशनल मीडिया ने गोबर में तीर मारते हुए कांग्रेस के खिलाफ एक नैरेटिव तैयार किया। लेकिन अंदर की कहानी यह है कि मिलिंद देवड़ा को कांग्रेस के नए पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उनसे परफॉर्म करने को कहा था। यहां तक कि राहुल गांधी भी उनसे काफी खफा थे। लगातार दो बार दक्षिण मुंबई की सीट से लोकसभा का चुनाव हारने के बाद पार्टी ने देवड़ा को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया। कोषाध्यक्ष बनने के बाद देवड़ा ने लिखा था कि अपनी क्षमताओं को पार्टी में सम्मान दिए जाने का मैं आभारी हूं। लेकिन जानकारों का कहना है कि कोषाध्यक्ष के तौर पर वह पार्टी से ज्यादा उद्योगपतियों के लिए काम करने लगे थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि देवड़ा की पहचान मुकेश अंबानी के आदमी के तौर पर रही है। ऐसे में जब राहुल गांधी ने बार-बार अंबानी और अडानी पर हमला बोलना शुरू किया। उन्हें क्रॉनि कैपिटलिस्ट बताने लगे तो देवड़ा काफी और असहज होने लगे और धीरे-धीरे अपने आप को पार्टी लाइन से अलग करने लगे। 

          सूत्र बताते हैं कि राहुल गांधी की यह बात उन्हें ठीक नहीं लगी। फिर भी वह कांग्रेस छोड़ना नहीं चाहते थे। क्योंकि कांग्रेस ने उन्हें महज 27 साल की उम्र में सांसद बनाया था। वह भाजपा प्रत्याशी जयवंतीबेन मेहता जैसे तैसे महज 10 हजार वोटो से जीते थे। मनमोहन सिंह ने उन्हें अपने कैबिनेट में जगह दी और पार्टी ने मुंबई कांग्रेस का उन्हें अध्यक्ष बनाया और उनकी अध्यक्षता में मुंबई में कांग्रेस की लुटिया डूबती चली गई। कृपाशंकर सिंह और संजय निरुपम जैसे लोग उनसे खफा होते चले गए। क्योंकि वह कार्यकर्ताओं से भी नहीं मिलते थे और पार्टी ऑफिस में भी उनका आना-जाना न के बराबर था। लेकिन इसके बावजूद वह 2024 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस के टिकट पर लड़ना चाहते थे। यहां तक कि मल्लिकार्जुन खड़गे ने दक्षिण मुंबई की सीट का उनसे वादा करने से साफ मना कर दिया। जबकि मिलिंद वादा चाहते थे। इतना ही नहीं उन्होंने स्थानीय नेताओं से उन्हें बेहतर ताल मेल बनाकर चलने का स्पष्ट निर्देश भी दिया। इसके बाद मिलिंद देवड़ा ने राहुल गांधी से मिलने का वक्त मांगा। लेकिन सूत्रों का दावा है कि राहुल गांधी ने उन्हें साफ-साफ संदेश दिया कि वह राष्ट्रीय अध्यक्ष की अनदेखी नहीं कर सकेंगे और बेहतर यह होगा कि वह खड़गे के निर्देशों पर ही काम करें। 

           मालूम हो कि दक्षिण मुंबई निर्वाचन क्षेत्र में मराठी, गुजराती, मारवाड़ी और जैन समुदाय के मतदाताओं की बड़ी संख्या है। जिसमें सबसे ज्यादा संख्या मराठी मतदाताओं की है। ऐसे में कांग्रेस यह सीट शिवसेना उबीटी के लिए छोड़ सकती थी। वैसे भी शिवसेना के ही अरविंद सावंत ने मिलिंद देवड़ा को हराया था। इससे मिलिंद देवड़ा के सामने यह स्थिति साफ हो गई थी कि 2024 के लोकसभा चुनाव में उनके सामने मुश्किल खड़ी हो सकती है। कुल मिलाकर कांग्रेस ने मिलिंद देवड़ा को यह समझा दिया था कि कार्यकर्ताओं और जनता की कीमत पर पार्टी को आपकी सेवाओं की जरूरत नहीं है। इसके बाद से ही मिलिंद तरह-तरह के विकल्पों की खोजबीन में जुट गए थे। बीजेपी में मिलिंद देवड़ा का निर्वाह मुश्किल था। क्योंकि दक्षिण मुंबई की सीट से इस बार भाजपा अपनी दावेदारी पेश करने वाली थी। अरविंद सावंत 2019 तक मोदी मंत्रिमंडल में मंत्री थे, तो जाहिर सी बात है की सावंत के आगे मिलिंद देवड़ा को टिकट मिल भी नहीं सकता था और बीजेपी भी नहीं देना चाहती थी। बावजूद इसके मिलिंद देवड़ा की कांग्रेस के बाद पहली पसंद बीजेपी थी। उन्होंने बीजेपी के लिए बहुत जोर भी लगाया। लेकिन सूत्रों का दावा है कि भाजपा ने दो टूक साफ-साफ कह दिया कि आना है तो आप बेशक पार्टी में आ जाइए। लेकिन हम आपको लोकसभा का टिकट नहीं दे पाएंगे। टिकट देना तो दूर की बात हम इस विषय पर विचार भी नहीं कर सकते। क्योंकि हमारे पास बहुत सारे लोग हैं। इसके बाद मिलिंद देवड़ा ने एकनाथ शिंदे पर डोरे डालना शुरू कर दिया। इधर शिंदे को भी NCP के प्रफुल्ल पटेल की तरह अपनी पार्टी के लिए एक आदमी की सख्त जरूरत थी। जो चुनाव के लिए पैसे का बंदोबस्त कर सके और जिसके बड़े उद्योगपतियों के साथ सीधे संबंध रहने के अलावा उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं ज्यादा बड़ी भी ना हो। क्योंकि शिंदे ने राज्य का सीएम बनकर महाराष्ट्र में राजनीतिक रसूख बना लिया था। लेकिन दिल्ली की राजनीति में उनका कोई नाम लेवा तक नहीं था। इस बात की उन्हें टीस थी। वह लंबे समय से अपने लिए एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल जैसे नेता की तलाश थी। जिसके पास राजनीति के साथ ऊंचे औद्योगिक घरानों में पैठ हो और उनसे काम निकालने का अनुभव भी पटेल की तरह ही मिलिंद देवड़ा भी लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक व्यवहार से अच्छी तरह परिचित थे। 

          उल्लेखनीय है कि 10 साल तक सांसद और 4 साल तक केंद्र में मंत्री रहे मिलिंद देवड़ा एकनाथ शिंदे की खोज में बिल्कुल फिट बैठ गए। लेकिन लोक सभा के लिए शिंदे भी तैयार नहीं हैं। क्योंकि अगर बीजेपी के साथ तालमेल हो गया तो मुंबई दक्षिण की सीट पर भाजपा राहुल नार्वेकर को चुनाव लड़ाना चाहती है। राहुल नार्वेकर फिलहाल विधानसभा के अध्यक्ष हैं, जिन्होंने बहुत कुशलता पूर्वक बागी विधायकों वाला पेचीदा मामला सुलझाया है। शिवसेना के विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक शिंदे ने मिलिंद देवड़ा को राज्यसभा में भेजने का वादा किया है। क्योंकि कुछ ही दिनों में शिवसेना उबीटी के सांसद अनिल देसाई का कार्यकाल पूरा होने वाला है और शिंदे उसी सीट पर मिलिंद देवड़ा को फिट करना चाहते हैं और बीजेपी को भी इस पर कोई एतराज नहीं है। क्योंकि मिलिंद देवड़ा मोदी को बहुत पसंद करते हैं। क्योंकि कांग्रेस छोड़कर शिवसेना ज्वाइन करने के बाद मिलिंद देवड़ा ने जो कहा वह साफ दर्शाता है कि वह कितने मजबूर हैं। यदि वे कांग्रेस नहीं छोड़े होते तो राजनीतिक तौर पर वह बिल्कुल समाप्त हो जाते। उन्होंने कहा कि यह मेरे लिए बेहद भावुक दिन है, मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कांग्रेस छोड़ दूंगा। आज मैं शिवसेना में शामिल हो गया। मुझे सुबह से बहुत सारे फोन आ रहे हैं कि मैं कांग्रेस पार्टी से अपने परिवार का 55 साल पुराना रिश्ता क्यों तोड़ा? जबकि सबसे चुनौती पूर्ण दशक के दौरान पार्टी के प्रति वफादार रहा। यदि कांग्रेस और शिवसेना उबीटी ने रचनात्मक, सकारात्मक सुझाव और योग्यता, क्षमता को महत्व दिया होता तो एकनाथ शिंदे और मैं यहां नहीं होते। जिस तरह एकनाथ शिंदे को एक बड़ा फैसला लेना पड़ा। इस तरह मुझे भी एक बड़ा निर्णय लेना पड़ा। एकनाथ शिंदे की मौजूदगी में शिवसेना में शामिल हुए मिलिंद देवड़ा ने कहा कि मैं पॉलिटिक्स ऑफ गेन यानी ग्रोथ, एस्पिरेशन, इंक्लूसीविटी और नेशनलिज्म में विश्वास करता हूं। मैं पेन यानी पर्सनल अटैक, इनजस्टिस, नेगेटिविटी की राजनीति में विश्वास नहीं करता। लेकिन सच्चाई है कि मिलिंद देवड़ा को कांग्रेस छोड़ना ही इसलिए पड़ा कि पार्टी को वह कॉर्पोरेट की तरह चलाना चाहते थे, कार्यकर्ताओं को कर्मचारी समझते थे और जन विश्वास को मार्केटिंग से हासिल करना चाहते थे और इससे भी बड़ा सच यह है कि अगर देवड़ा ने कांग्रेस को समय रहते खुद ना छोड़ा होता तो वह निकाल दिए गए होते। 

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